लोकतंत्र का युग स्वर्णिम
हमारे गांव कि कैद
नसीब ऐसी
बंजर-कांटेदार जमीन जैसी
जहां ना पहुंची आज़ादी
ना ही संविधान की परछाई ………
कैसी आज़ादी……?
कैसा लोकतंत्र ……?
वहां वही बात पुरानी
जातिवाद का उठत धुँआ
अपवित्र शोषित बस्ती का,
हैंडपाइप और कुंआ ………
चौखट-चौखट जमीदारी,
पैमाइश
शोषित का तन-मन जैसे
कंगलो नुमाइश ………
अरे लोकतंत्र के पहरेदारो
जागो
स्वार्थ को अब त्याग दो
लोकतंत्र का बिगुल,
बजा दो ………
हमारे गांव कि कैद
नसीब ऐसी
बंजर-कांटेदार जमीन जैसी
जहां ना पहुंची आज़ादी
ना ही संविधान की परछाई ………
कैसी आज़ादी……?
कैसा लोकतंत्र ……?
वहां वही बात पुरानी
जातिवाद का उठत धुँआ
अपवित्र शोषित बस्ती का,
हैंडपाइप और कुंआ ………
चौखट-चौखट जमीदारी,
पैमाइश
शोषित का तन-मन जैसे
कंगलो नुमाइश ………
अरे लोकतंत्र के पहरेदारो
जागो
स्वार्थ को अब त्याग दो
लोकतंत्र का बिगुल,
बजा दो ………
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